मंगलवार, 22 मार्च 2016

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणा-पत्र


लाहौर कांग्रेस में बांटे गए इस दस्तावेज़ को मुख्य तौर पर भगवतीचरण वोहरा ने लिखा था। दुर्गा भाभी और अन्य क्रान्तिकारी साथियों ने इसे वहाँ वितरित किया। सी. आई. डी. ने इसे पकड़ लिया था और उसी के कागजों में इसकी प्रति मिली। -सं.
स्वतंत्रता का पौधा शहीदों के रक्त से फलता है. भारत में स्वतंत्रता का पौधा फलने के लिए दशकों से क्रांतिकारी अपना रक्त बहाते रहे हैं. बहुत कम लोग हैं जो उनके मन में पाले हुए आदर्शों की उच्चता तथा उनके महान बलिदानों पर प्रश्नचिन्ह लगाएं, लेकिन उनकी कार्यवाहियाँ गुप्त होने की वजह से उनके वर्तमान इरादे और नीतियों के बारे में देशवासी अंधेरे में हैं, इसलिए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने यह घोषणापत्र जारी करने की आवश्यकता महसूस की है।
विदेशियों की गुलामी से भारत की मुक्ति के लिए ये एसोसिएशन सशस्त्र संगठन द्वारा भारत में क्रांति के लिए दृढ़ संकल्प है। गुलाम रखे हुए लोगों की और से स्पस्ट तौर पर विद्रोह से पूर्व गुप्त प्रचार और गुप्त तैयारियाँ होनी आवश्यक हैं। जब देश क्रान्ति की उस अवस्था में आ जाता है तब विदेशी सरकार के लिए उसे रोकना कठिन हो जाता है। वह कुछ देर तक तो इसके सामने टिक सकती है, लेकिन उसका भविष्य सदा के लिए समाप्त हो चुका होता है। मानवीय स्वाभाव भ्रमपूर्ण और यथास्थितिवादी होने के कारण क्रान्ति से एक प्रकार का भय प्रकट करता है। सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताकत और विशेष सुविधाएँ माँगनेवालों के लिए भय पैदा करता है। क्रान्ति एक ऐसा करिश्मा है जिसे प्रकृति स्नेह करती है और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती – न प्रकृति में न इंसानी कारोबार में। क्रन्ति निश्चय ही बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिन्दा मुहिम नहीं है और न ही यहाँ-वहाँ चंद बम फेंकना और गोलियाँ चलाना है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समयोचित न्याय और समता के सिद्धान्त को खतम करना है। क्रान्ति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं है और न ही सरफ़रोशो का कोई सिद्धान्त है। क्रान्ति ईश्वर विरोधी हो सकती है, लेकिन मनुष्य विरोधी नहीं। यह एक पुख़्ता और जिंदा ताकत है। नये और पुराने के, जीवन जिन्दा मौत के, रोशनी और अँधेरे के आन्तरिक द्वन्द का प्रदर्शन है, कोई संयोग नहीं है। न कोई संगीतमय एकरसता है और न ही कोई ताल है, जो क्रान्ति के बिना आयी हो। ‘गोलियों का राग’ जिसके बारे में कवि गाते हैं, सच्चाई रहित हो जायेगा अगर क्रान्ति को समूची श्रृष्टि से खतम कर दिया जाये। क्रान्ति एक नियम है, क्रान्ति एक आदेश है और क्रान्ति एक सत्य है।
हमारे देश के नौज़वानों ने इस सत्य को पहचान लिया है। उन्होंने बहुत कठिनाइयाँ सहते हुए यह सबक सीखा है कि क्रांति के बिना- अफ़रा-तफ़री, क़ानूनी गुण्डागर्दी और नफ़रत की जगह, जो आजकल हर ओर फैली हुई है – व्यवस्था, क़ानूनपरस्ती और प्यार स्थापित नहीं किया जा सकता । हमारी आर्शीवाद-भरी धरती पर किसी को ऐसा विचार नहीं आना चाहिए कि हमारे नौजवान ग़ैर-ज़िम्मेदार हैं। वे पूरी तरह जानते हैं कि वे कहां खड़े हैं. उनसे बढ़कर किसे मालूम है कि उनकी राह कोई फूलों की सेज नहीं है. समय-समय पर उन्होंने अपने आदर्शों के लिए बहुत बड़ी क़ीमत चुकाई है.इस कारण यह किसी के मुंह से नहीं निकलना चाहिए कि नौजवान उतावलेपन में किन्ही मामूली बातों के पीछे लगे हुए हैं।
यह कोई अच्छी बात नहीं है कि हमारे आदर्शों पर कीचड़ उछाला जाता है. यह काफ़ी होगा अगर आप जानें कि हमारे विचार बेहद मज़बूत और तेज़-तर्रार हैं जो न सिर्फ़ हमें आगे बढ़ाए रखते हैं बल्कि फांसी के तख़्ते पर भी मुस्कराने की हिम्मत देते हैं।
आजकल यह फ़ैशन हो गया है कि अहिंसा के बारे में अंधाधुंध और निरर्थक बात की जाए.महात्मा गांधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आंच नहीं आने देना चाहते, लेकिन हम यह दृढ़ता से कह सकते हैं कि हम देश को स्वतंत्र कराने के उनके ढंग को पूर्णतया नामंजूर करते हैं। यदि हम देश में चलाए जा रहे उनके असहयोग आंदोलन द्वारा लोक जागृति में उनकी भागीदारी के लिए उनकों सलाम न करें तो यह हमारे लिए बड़ा नाशुक्रापन होगा. परंतु हमारे लिए महात्मा असंभवताओं का एक दार्शनिक हैं। अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है, लेकिन यह अतीत की चीज़ है। जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ़ अहिंसा के रास्ते से कभी भी आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते। दुनिया सिर तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया हम पर हावी है। अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं, लेकिन हम जो गुलाम क़ौम हैं, हमें झूठे सिद्धांतों के ज़रिए अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए। हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा की लूट और ग़रीब की लूट से भरा हुआ है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने का क्या तुक है? हम अपने पूरे ज़ोर के साथ कहते हैं कि क़ौम के नौजवान कच्ची नींद के ऐसे सपनों से रिझाए नहीं जा सकते।
हम हिंसा में विश्वास रखते हैं – अपने आप में अन्तिम लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक नेक परिणाम तक पहुँचाने के लिए अपनाए गये तौर-तरीके के नाते। अहिंसा के पैरोकार और सावधानी के वकील यह बात तो मानते हैं कि हम अपने यकीन पर चलने और उसके लिए कष्ट सहने के लिए तैयार रहते हैं। तो क्या हमें इसीलिए अपने साथियों की साझी मॉं की बलिवेदी पर कुर्बानियों की गिनती करानी पडग़ी? अंगेजी सरकार की जेलों की चारदीवारी के अन्दर रूह कॅंपा देने और दिल की धडक़न पकडऩे वाले कई दृश्य खेले जा चुके हैं। हमें हमारी आतंकवादी नीति के कारण कई बार सजाएँ हुई हैं। हमारा जवाब है कि क्रान्तिकारियों का मुद्दा आतंकवाद नहीं होता; तो भी हम यह विश्वास रखते हैं कि आतंकवाद के रास्ते ही क्रान्ति आ जायेगी। पर इसमें कोई शक नहीं है कि क्रान्तिकारी बिल्कुल दुरूस्त सोचते हैं कि अंग्रेजी सरकार का मुँह मोडऩे के लिए इन तरीकों का इस्तेमाल करना ही कारगर तरीका है। अंग्रेजों की सरकार इसलिए चलती है, क्योंकि वे सारे भारत को भयभीत करने में कामयाब हुए हैं। हम इस सरकार दहशत का किस तरह मुकाबला करें? सिर्फ क्रान्तिकारियों की ओर से मुकाबले की दहशत ही उनकी दहशत को रोकने में कामयाब हो सकती है। समाज में एक लाचारी की गहरी भावना फैली हुई है। इस खतरनाक मायूसी को कैसे दूर किया जाये? सिर्फ कुर्बानी की रूह को जगाकर खोये आत्म विश्वास को जगाया जा सकता है। आतंकवाद का एक अन्तर्राष्ट्रीय पहलू भी है। इंग्लैण्ड के काफी शत्रु हैं जो हमारी ताकत के पूर्ण प्रदर्शन से हमारी सहायता करने को तैयार हैं। यह भी एक बडा लाभ है।
.भारत साम्राज्यावाद के जुए के नीचे पिस रहा हैl इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और ग़रीबी के शिकार हो रहे हैंl भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो मज़दूरों और किसानों की है, उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है। भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है। उसके सामने दोहरा ख़तरा है – विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ़ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ़ से ख़तरा है। भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ रोज़ाना बहुत से गठजोड़ कर रहा है। कुछ राजनैतिक नेताओं का डोमिनयन (प्रभुतासंपन्न) का रूप स्वीकार करना भी हवा को इसी रुख़ को स्पष्ट करता है।
भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वासघात की कीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है. इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और सिर्फ़ यही पूर्ण स्वराज और सब भेदभाव खत्म करने में सहायक हो सकता है। देश का भविष्य नौजवानों के सहारे है। वही धरती के बेटे हैं। उनकी दुख सहने की तत्परता, उनकी बेखौफ और लहराती कुर्बानी दर्शाती है कि भारत का भविष्य उनके हाथ में सुरक्षित है। एक अनुभूतिमय घडी में देशबन्धु दास ने कहा था, “नौजवान भारत माता की शान एवं आशाएँ। आन्दोलन के पीछे उनकी प्रेरणा है, उनकी कुर्बानी है और उनकी जीत है। आजादी की राह पर मशालें लेकर चलनेवाले ये ही हैं। मुक्ति की राह पर ये तीर्थ यात्री हैं।”
भारतीय रिपब्लिक के नौजवानो, नहीं सिपाहियों, कतारबद्ध हो जाओ। आराम के साथ न खडे रहो और न ही निरर्थक कदमलाल किये जाओं। लम्बी दरिद्रता को, जो तुम्हें नाकारा कर रही है, सदा के लिए उतार फेंको। तुम्हारा बहुत ही नेक मिशन है। देश के हर कोने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रान्ति के लिए, जिसका आना निश्चित है, लोगों को तैयार करो। फर्ज के बिगुल की आवाज सुनो। वैसे ही खाली जिन्दगी न गँवाओं। बढ़ो, तुम्हारी जिन्दगी का हर पल इस तरह के तरीके और तरतीब ढूँढने में लगना चाहिए, कि कैसे अपनी पुरातन धरती की आँखों में ज्वाला जागे और एक लम्बी अँगडाई लेकर जागे। अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ नवयुवकों के उर्वर हृदयों मे एक उकसाहट और नफरत भर दो, ऐसे बीज डालो जोकि उगें और बडे वृक्ष बन जायें क्योंकि इन बीजों को तुम अपने गर्म खून के जल से सींचोगे। तब एक भयानक भूचाल आयेगा, जो बडे धमाके से गलत चीजों को नष्ट कर देगा और साम्राज्यवाद के महल को कुचलकर धूल में मिला देगा और यह तबाही महान होगी।
तब, और सिर्फ तभी, एक भारतीय कौम जागेगी, जो अपने गुणों और शान से इन्सानियत को हैरान कर देगीँ जब चालाक और बलवान सदा से कमजोर लोगों से हैरान रह जायेंगे। तभी व्यक्तिगत मुक्ति भी सुरक्षित होगी और मेहनतकश की सरदारी और प्रभुसत्ता को सत्कारा जायेगा। हम ऐसी ही क्रान्ति के आने का सन्देश दे रहे हैं। क्रान्ति अमर रहे!
—करतार सिंह
अध्यक्ष
रिपब्लिकन प्रेस, अरहवन, भारत से प्रकाशित।
Date Written: 1929;
Author: Bhagat Singh and his comrades;
Title: Manifesto of the Hindustan Socialist Republican Association. (Hindustan Socialist Republican Association ka ghoshanpatra);
Prepared by B.C. Vohra, it was widely distributed at the time of the Lahore Session of the Congress in 1929. Found with CID papers.

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

असुविधा: जिन रगों में में बहते थे अरमान से

असुविधा: जिन रगों में में बहते थे अरमान से

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रहनुमा गुमराह हो बेशक मगर ,
खेलेंगे ये खेल हम जी-जान से !!

पूरी ग़ज़ल में यह शेर एक शम्मा की तरह है जैसे जिसे यकायक बिजली चले जाने के बाद कोई जलाकर रख गया हो ! यह उजाला हमें हमारी पहचान से जोड़े रखेगा !
इस ग़ज़ल की खासियत यह है कि सभी शेर एक ही भाव-भूमि पर कहे गए हैं ! बहुत बहुत बधाई बुधवार जी और अशोक जी का धन्यवाद !

सोमवार, 28 नवंबर 2011

असुविधा: ओबामा के रंग में यह कौन है- लीलाधर मंडलोई

असुविधा: ओबामा के रंग में यह कौन है- लीलाधर मंडलोई: ख्यात और अब वरिष्ठ हो चले कवि लीलाधर मंडलोई की यह कविता कल भाई कुमार मुकुल की फेसबुक वाल पर पढ़ी. पढने के बाद जिस कदर रोमांचित हुआ, म...

सोमवार, 21 नवंबर 2011

न मिले 
मुझे कुछ ऐसा 
जो अपने साथ लाता हो 
खो जाने का भय ,
तुम भी नहीं !
किसी के जाने के बाद -
बड़ा  हो जाता है घर, आँगन ,
लम्बी हो जाती है 
कपडे सुखाने की रस्सी ,
बर्तन फालतू ,
कम हो जाती हैं लेकिन 
आँगन की चिड़ियाँ ,
तुलसी की पत्तियाँ ,
अगरबत्तियाँ अधजली ,
भिखारी की टेर !
दूध का ,धोबी का हिसाब 
अब डायरी पे नहीं लिखा जाता है ,
अखबार दो और लगा लिए हैं 
ज्यादा आया है इस बार बिजली का बिल ,
फोन कटवा दिया है !

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

तसल्ली


सोंचता हूँ कि--
कविता की जगह 
एक चित्र बना दूँ , 
जिसमें फूल हों ,पत्तियाँ हों
और इसी किस्म की तमाम चीज़ें 
कुछ इस ढंग से रखूँ 
कि खाली जगहों के आकार 
उन चीज़ों से मिलते-जुलते हों 
जिनकी ज़रूरत 
रोटी खाने के बाद पैदा होती है ,
और जिनका देखा जाना 
बहुतों में तसल्ली पैदा करता है ,
शायद इस तसल्ली के बदले 
लोग मुझे रोटी देदें !

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

बे-चेहरा ख़ाब

ये रात-ख़ुद भी नहीं सोती 
करवटें बदलती रहती है 
और एक 
बे-चेहरा ख़ाब 
बेचैन-ओ-परेशां 
भटकता रहता है 
करवट-दर-करवट 
ज़िंदगी के तिलस्मी 
आइनाघर में ,
ख़यालों की भीड़ में
गुम हो चुके उस 
चेहरे की खोज में 
जो कभी उसका था !

हरेक आइना 
उसे एक चेहरा 
दिखाता है 
जिसे देख वह कुछ 
ठिठकता है 
मगर फिर 
आगे बढ़ जाता है !

एक रात मैंने उसे 
रोक कर पूछा -
मुद्दतों हुए तुम्हें 
यूहीं भटकते ,
और ये आईने
तुम्हारे चेहरे की 
ठीक ठीक नक़ल भी 
अब तक न बना पाए ,
पुराने पड़ चुके उस
चेहरे को आखिर तुम 
कैसे पहचानोगे ,
अब तक तो 
टूट फूट घिस कर 
कितना कुछ 
बदल चुका होगा वह !

वह बोला -
मेरे चेहरे की पेशानी पर 
मुसीबतों के बोसे का 
स्याह निशान है 
वह न बदला होगा 
उसी से पहचानूँगा,
आम आदमी की
ज़िंदगी के ख़ाब का
चेहरा जो ठहरा !!